आओ जलाएं कंडे की होली, यह शुभ-लाभ का भी प्रतीक है

अशोकनगर । होली का पर्व नजदीक है। नवदुनिया ने कंडे की होली जलाने के लिए आओ जलायें कंडे की होली के लिए आम लोगों को प्रेरित करने का अभियान चलाया है। होली में कंडों का उपयोग किए जाने से वह शुभ-लाभ का प्रतीक है तथा पर्यावरण के लिए उपयोगी है। होली पर हर बार पूरे जिले में यदि इस तरह की जागरूकता न दिखाई जाये तो हजारों पेड अग्नि को समर्पित हो जाते है। जिन्हें बचाया जाना बहुत जरूरी है। पेडों को जलाना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। जहरीला धुंआ पूरे वातावरण को दूषित करता है और कंडे की होली से वातावरण दूषित होने से बचता है।


स्थानीय इलेक्ट्रोनिक्स व्यापारी पंकज अग्रवाल ने कहाकि कंडे की होली जलाने के प्रति आम जनमानस में जागरूकता आ रही है। नवदुनिया का यह प्रयास समाज के लिए एक जागरूक करने का अभियान है। जो अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस प्रयास से हजारों पेड होली पर भेंट चढ़ने से बच जाते है। कंडे की होली जलाने से ऑक्सीजन भी मिलती है। बाजार में कंडे भी सस्ते है और लकडी महंगी है। इसलिए कंडों का उपयोग ही होली में किया जाना चाहिए। जिसके लिए प्रशासन को कंडे आसानी से उपलब्ध हो सके, इसके लिए प्रयास किए जाना चाहिए।


 

सामाजिक कार्यकर्ता जुगल दुबे ने कहाकि कंडे की होली की लकड़ी भी तैयार हो रही है। जिसमें गोबर का उपयोग किया जाता है। जहां कंडे आसानी से उपलब्ध हो रहे है वहां होली में कंडों का ही उपयोग हो। जहां गोबर की लकड़ी मिल रही है वहां उसका उपयोग किया जाये। इससे पशुपालन का बढ़ावा मिलता है जिससे वातावरण शुद्घ होगा और गाय के गोबर का उपयोग अधिक से अधिक हो सकेगा। हमारी संस्कृति में गोबर का बहुत महत्व है। कोई भी शुभ कार्य गोबर लीपकर ही किया जाता है। ऐसे में यदि होली में कंडों का उपयोग होगा तो यह शुभ-लाभ का प्रतीक है।


 

जिला कर्मचारी कांग्रेस के अध्यक्ष प्रमोद जैन ने कहाकि उन्हें 35 वर्ष पुराने रंगों की होली आज भी याद आ जाती है। उसमें जो होली मनाने का आनंद था अब वह आनंद नजर नहीं आता। होली की तैयारियां कई दिन पहले होती थी । जिस दिन होली होती थी उस दिन कई बार रंग लगाते थे और लगवाते थे लेकिन अब वह दिन लौटकर दिखाई नहीं पड़ते। बचपन की होली यादों की स्मृतियों में खो गयी है। उस जमाने की होली हर होली के दिनों में याद आती है। वो दोस्तों की महफिल, वो सामूहिक होली का आनंद अब बदले हुए समय में नजर नहीं आता।


सामाजिक कार्यकर्ता दशरथ सिंह रघुवंशी ने कहाकि उनके गांव धतूरिया में होली के दिन गांव में घरों पर कीचड़, गोबर और धूल फैंकी जाती थी। दूज के दिन गांव के लोग गाजे-बाजों के साथ सामूहिक रूप से देव स्थान पर बैठकर होली के गीत, फागें गाते थे। मिलकर गांव की होली मनाई जाती थी। होली का आनंद अब नजर नहीं आता। सबकुछ दुर्लभ होता जा रहा है। होली हमारी संस्कृति का अंग है। यह हमारे त्यौहारों में महत्वपूर्ण त्यौहार है। जिसकी पावनता व पवित्रता हमसे है। हम शालीनता के साथ होली मनाये।


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